• श्री हनुमानबाग मंदिर
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 परिचय - पं. श्री ब्रजेश मिश्रा, महाराज जी



   उमा जे राम चरण रत विगत काम मद क्रोध |
निज प्रभुमय देखहिं जगत केही सन करहिं विरोध ||

शिवजी कहते है कि उमा, जो मनुष्य काम क्रोध मोह मद जैसे समस्त विकारों को त्याग कर राम नाम का ही आधार पर जीते है तो समस्त जगत उन्हें राममय ही दिखता है और राम में ही समस्त जगत मिल जाता है | फिर उन्हें राम के अतिरिक्त कुछ भी पाने की जिज्ञासा नहीं रह जाती |

      विगत दो वर्षों से हम जिस दिव्य व्यक्तित्व के जीवन परिचय को पढ़ते आ रहा है उन्हें पूर्ण रूपेण जानना या समझ पाना वास्तव में अम्बर को छोर ढूढने जैसा कार्य हैं |

  नन्हें बालक ब्रजेश का जन्म जब हुआ तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि इस बालक का जीवन या कर्म क्या होगा | अपने नन्हें - नन्हें हाथों एवं ललाट की रेखाओं में अध्यात्म के कौन से आयाम विद्धमान है यह तो अकल्पनीय सी बात रही होगी परन्तु बाल्य काल से ही भगवान राम के जीवन चरित्र में लालसा, रामलीलाओं में रूचि और भगवत कथाओं में अदभुत आनंद ऐसी ही दिनचर्या में दिन और रात बीतते थे | यह रामरस की प्रीति और राम जी का अनुराग नित्य हनुमान जी महाराज के चरणों की ओर आकृष्ट करता गया | बालक ब्रजेश धीरे-धीरे तरुण फिर किशोर और युवा अवस्था की ओर बढ़ते गए तो कहते हैं ना कि-

  वही जानाहि जेहू देहि जनाई |
  जानत तुम्हीं तुम्हहिं होई जाई ||

  और हुआ भी यही, युवा अवस्था तक आते आते आपने अपने जीवन का एक और सिर्फ एक ही धाय बना लिया वो था ‘रामसेवा’ | भक्त शिरोमणि श्री मारुति नंदन की अटूट सेवा का फल यह हुआ कि प्रभु ने अपनी भक्ति प्रदान की और आपने लोगों की सेवा करना प्रारंभ कर दिया बड़े-बड़े तपस्वी, मनीषि अथवा सन्यासी जो कृपा ज्ञान वर्षों की जटिल साधना में पाते है वह आप को श्री हनुमानजी महाराज की सहज कृपा से प्राप्त हो गया |

  परमानन्द कृपायतन मन परिपूरन काम
  प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम

  रामजी के प्रति अनुराग ने जीवन को एक नई दिशा प्रदान की और आप हनुमान बाग़ मंदिर में प्रभु की सेवा करते-करते मन में विचार कर बैठे कि नित्य आरती के उपरांत एवं दैनिक परिपर्चा में प्रभु की जयकार लगाते है कि “राजा रामचंद्र की जय” परन्तु भगवान श्री राजा रामजी के उस स्वरुप के दर्शन नहीं हो पाए | गांव शहर बस्ती नगर जहाँ भी गए परंतु रामजी के उस स्वरुप को देखने की तृष्णा नित बढती गयी | फिर एक दिन हनुमान जी महाराज की प्रेरणा से ही मंदिर में बैठे-बैठे प्रभु के समूर्ण राज दरबार को विराजित करने का कार्य कठिन था परन्तु जिनको हनुमान जी पर विश्वास हो तो उनके कार्य प्रभु श्रीराम स्वयं बनाते है | इसी क्रम में 27 नबंवर 2007 में सम्पूर्ण राज दरबार की स्थापना हेतु भूमि पूजन परमपूज्य डॉ. राजेश्वर चैतन्य ब्रम्हचारीजी महाराज के शुभ कर कमलों से कराया और श्रीरामभक्त हनुमान बाग़ सेवा समिति का गठन किया | तत्पश्चात एक नई यात्रा प्रारंभ की भगवान श्रीराम के सम्पूर्ण राज दरबार की स्थापना की | अनेकों अनेक कारीगरों से मिलते गए थोडा-थोडा संजोकर 8 वर्षों में हनुमानबाग़ धाम को राम राज्य के रूप में साकार किया | 28 मार्च 2015 को भगवान का वह स्वरुप स्थापित किया और हम सभी को पुण्य प्रदान किया इतने पर भी आपकी निर्मलता और सहजता है कि

  “स्वयं सिद्ध सब काज,
  नाथ मोहि आदर दीजै”

  श्री राजाराम राज दरबार की प्राण प्रतिष्ठा का संकल्प पूर्ण होने के साथ मार्गदर्शन में अनेक सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए भावी योजनाओं पर कार्य प्रस्तावित है | गौपालन एवं संरक्षण, नि:शुल्क संस्कृत विद्यालय, औधोगिक प्रशिक्षण संस्थान, वृद्धाश्रम आदि प्रमुख हैं|

श्री महाराज जी के चरणों में हमारा
सादर नमन
डॉ. आशीष मिश्रा एवं आशु सेठी